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Saturday, January 15, 2011

कितना कुछ था जो वक्त के साथ ही चूक गया था, तब तो शायद लगता भी नही था, कि जिसके साथ मौसम फरिश्तों जैसा है, जो आज के अकेलेपन को बहुत सिसकने के बाद मिला है, और जिसके बाद वो रब से कुछ मांग भी नहीं पाएगी, वह शेखर, आज का तोहफा नहीं, कल की आज़माइश साबित होगा, वो जिसके नाम के रात-दिन वह आज जीती है, वही उसके आनेवाले कल को गुमनाम छोड़ जाएगा, आज जिसके नाम से मौसमों में महक है, वह कल की सबसे ज्यादा घुटन भरी हवा साबित होगा! उसने खुद से बाहर आने की कोशिश की उफ्फो!!! असेम्बली पूरी खाली; सब लोग कब के जा चुके थे, एक वही थी, जो.......अपनी उचाट सी नज़रें उठा कर उसने  असेम्बली के सन्नाटे को घूरा:
"इस कमरे में ख्वाब रखे थे, कौन यहाँ पर आया था
गुमसुम  रोशनदानो बोलो क्या तुमने कुछ देखा था...."
"लो बहन जी यहाँ बैठी हैं! आपको कुछ खबर है ज़माने की! सारा कोलेज खाली हो गया है सब जा चुके हैं ...आप हैं कि....!!!"
सुषमा की तुनक भरी आवाज़, उसे लगा जैसे कहीं बहुत गहरे कुए से आ रही हो, उसने मुस्कुरा कर उसे देखा, सामान समेटा, और कहा," बस!!!! आ ही रही थी मै." लान  के सुन्दर फूल, गहरी हरी घास, खुली हवा, उसे लगा दो मिनट के लिए जेसे फिर जी ली हो वह, बस, उन्ही दो मिनट तो भूल पाई थी उसे.....वही दो मिनट ज़िंदगी के....बाकी फिर, मौत!!!!
भूलें हैं रफ्तां-रफ्तां, तुझे मुद्दतों के बाद
किस्तों  में खुदकशी का, मज़ा हम से पूछिए....
(बाकी आईन्दा.........)
     

1 comment:

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    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

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