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Sunday, June 20, 2010

खिसकी से डूबते सूरज का  पीला होकर गहराता  मंज़र साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा था. .........(बाकी aaiyndaa)

Thursday, June 17, 2010

                            
         अँधेरी राह में कांटे, पाँव में छाले मंजिल दूर
         ऐसी भयानक घडियो में ही प्यार को परखा जाता है
         सच है आखिर कोई ज़्यादा दिन दीवाना कैसे रह सकता है, मोनिका ने उठ कर खिड़की खोली, ठंडी हवा का ताज़ा झोंका उसके वजूद से टकराया, और घुटन ओंर तपिश से आजिज़ उसके जिस्म को राहत मिली.थक कर निढाल सा पडा जिस्म पलंग के सरहाने का सहारा पाकर जैसे शादाब सा हो गया था.. उसकी आँखे खुद- ब- खुद बंद होने लगीं. हज़ार टेंशन और परेशानियों के बावजूद जैसे नींद अपना रास्ता खुद ही बना लेती है, आँख लगी, झटके से खुली, फिर लगी उसे लगा कोई था पर हकीकत में कोई भी नहीं था, उसने मुस्कुरा कर फिर आँखे मूँद ली, वह तो चाहती भी नहीं थी की अब कोई आए, इंतज़ार करते करते जैसे उसे अब इस ही में मज़ा आने लगा था,...........(बाकी आईंदा)